अध्‍ययन का सारांश

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शिक्षा, संचार, आजीविका और सरकारी या हकदारीमूलक सेवाएं प्राप्‍त करने के लिए इंटरनेट अब एक आवश्‍यक साधन बन गया है। इंटरनेट का उपयोग न तो विलासिता का मामला है और न ही किसी का विशेषाधिकार। डिजिटल संचार की मौजूदा दुनिया में जिन तक इंटरनेट की पहुंच नहीं है (या उनकी सीमित पहुंच हो) वे पिछड़ते जा रहे हैं। सीसीडीएस का यह अध्‍ययन तेजी से विकसित होते भारतीय शहरी जीवन में डिजिटल संचार साधनों की असमानता की स्‍थिति को समझने और गरीब और वंचित परिवारों की इंटरनेट तक पहुंच बनाने में पेश आ रहीं रुकावटों की पहचान करने से संबंधित है।

इंटरनेट जैसे डिजिटल संचार साधनों से वंचित समुदाय वही (जिनकी इंटरनेट तक पहुंच नहीं) है, जो सामाजिक असमानता के मापकों में भी वंचित माना गया है। इनमें वह गरीब तबका शामिल है, जिसके पास इंटरनेट को चलाने के लिए समुचित आर्थिक साधन नहीं है, साथ में वे भी जिनमें इसके लिए जरूरी शैक्षणिक योग्‍यता और कंप्‍यूटर दक्षता नहीं है या फिर वे महिलाएं जो डिजिटल तकनीक के इस्‍तेमाल की स्‍वतंत्रता नहीं रखतीं। यह डिजिटल असमानता वंचित वर्गों में सामाजिक असमानताओं में और बढ़ोतरी कर देती है, इसलिए डिजिटल असमानता को समावेशी विकास और जन नीतियों का मुद्दा माना जाता है।

पिछले दो दशकों में दुनियाभर के सामाजिक वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने विकसित-विकासशील और गरीब देशों, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों और स्‍त्री-पुरुष के बीच डिजिटल संचार साधनों के उपयोग में असमानता का अध्‍ययन किया है। हालांकि, डिजिटल साधनों से बेहतर जुड़े शहरी क्षेत्रों के भीतर इस असमानता को लेकर ज्‍यादा अध्‍ययन नहीं हुए हैं।

सीसीडीएस का अध्‍ययन पुणे शहर में निम्‍न आय वर्ग और सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ी आबादी के बीच व्‍यापक रूप से रुकावटों को तलाशने का प्रयास है। पुणे महाराष्‍ट्र का प्रमुख शहर है, जहां की 40 प्रतिशत जनसंख्‍या नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों में रहती है। डिजिटल असमानता के परिमाण संबंधी आंकड़े और उनके कारण शहरी वंचित वर्ग के बीच समावेशी विकास को लेकर गहराई में महत्‍वपूर्ण जानकारी पेश करते हैं।

डिजिटल असमानता का दायरा

सीसीडीएस का अध्‍ययन जुलाई 2013 से दिसंबर 2015 के बीच का है, जिसमें पुणे के शहरी समुदाय की 6 नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों में 10 प्रतिशत परिवारों यानी कुल 1634 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। इस अध्‍ययन से पता चलता है कि इंटरनेट उपयोगकर्ता की व्‍यापक परिभाषा को, जिसमें वे परिवार भी शामिल किए गए, जिन्‍होंने बीते 3 माह में किसी भी साधन से , कहीं भी इंटरनेट का उपयोग किया है, मूल में रखने के बावजूद केवल 18 प्रतिशत वयस्‍क ही इसके उपयोगकर्ता पाए गए। इसके अलावा अध्‍ययन में रहवासी परिवारों में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच लिंग, आयु, शिक्षा, आर्थिक स्‍थिति और आजीविका के मामले में असमानता दिखाई पड़ी।

डिजिटल असमानता और लैंगिक भेदभाव : अध्‍ययन में शोध क्षेत्र में एक बड़ी लैंगिक असमानता पाई गई। इसके अनुसार 58 प्रतिशत पुरुष इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मुकाबले केवल 16 प्रतिशत महिला इंटरनेट उपयोगकर्ता ही मिलीं। इंटरनेट का उपयोग न करने वाली महिलाओं की संख्‍या पुरुषों की तुलना में दोगुनी पाई गई।

डिजिटल असमानता और आयु : इंटरनेट के उपयोग में आयु का भी एक बड़ा अंतर पाया गया। 64 प्रतिशत उपयोगकर्ता 16-20 साल के आयु वर्ग के थे। केवल 7 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता ही 35 साल से ज्‍यादा उम्र के मिले।

डिजिटल असमानता और शिक्षा का संबंध : शिक्षा का स्‍तर बढ़ने के साथ ही इंटरनेट का उपयोग भी बढ़ता है। अशिक्षित या केवल प्राथमिक स्‍तर तक की शिक्षा प्राप्‍त इंटरनेट उपयोगकर्ता कम ही पाए गए। वे परिवार, जिसमें सदस्‍यों ने स्‍कूली शिक्षा पूरी की या कम से कम दसवीं तक की पढ़ाई की, उनमें इंटरनेट के उपयोग के मामले अशिक्षित परिवारों की तुलना में तीन गुना अधिक रहे।

डिजिटल असमानता के आर्थिक अंर्तसंबंध : इंटरनेट का कि‍फायती होना इस माध्‍यम के उपयोग का मजबूत नि‍र्धारक है। इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं का ज्‍यादा प्रति‍नि‍धि‍त्‍व संपन्‍न वर्ग के लोगों का है।

आजीवि‍का और डि‍जि‍टल असमानता के बीच संबंध : संगठि‍त और असंगठि‍त क्षेत्रों में सुरक्षि‍त आजीवि‍का प्राप्‍त लोगों और वि‍द्यार्थियों के इंटरनेट का उपयोग करने की ज्‍यादा संभावना है, बजाय दि‍हाड़ी मजदूरों और कामकाज न करने वाले लोगों के।

डिजिटल असमानता और जागरूकता का संबंध : पुणे शहर के हाशिए में जहां अध्‍ययन क्षेत्र के रहवासी परिवार बसे हैं, इंटरनेट का उपयोग न करने वाले करीब 40 फीसदी लोगों ने कभी इसके बारे में सुना ही नहीं।

इंटरनेट तक पहुंच के रास्‍ते में रुकावटें

ढांचागत साधनों की कमी – शहर की नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों में वायरलाइन ब्रॉडबैंड इंटरनेट सुविधा उपलब्‍ध नहीं है। हालांकि, बस्‍तियों से लगे व्‍यावसायिक और मध्‍यम आय वर्ग के इलाकों में इनकी आसान उपलब्‍धता हो सकती है। नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों के आसपास मुफ्त या रियायती दरों पर इंटरनेट के सार्वजनिक उपयोग के स्‍थान भी नहीं हैं। सायबर कैफे बस्‍तियों से दूर हैं। रहवासियों ने मोबाइल दूरसंचार ऑपरेटरों के नेटवर्क में कनेक्‍टिविटी और कवरेज के बारे में विभिन्‍न प्रकार की समस्‍याएं सामने रखीं की। ये सभी इंटरनेट के उपयोग के रास्‍ते की रुकावटें हैं।

आर्थिक साधनों की कमी – गरीब परिवारों के पास कंप्‍यूटर, डोंगल, स्‍मार्टफोन और फीचर फोन के अलावा इंटरनेट सेवाओं का उपयोग करने के लिए साधनों को जुटाने के आर्थिक साधन नहीं हैं।

शैक्षणिक रुकावटें – इंटरनेट उपयोग के कारणों में शिक्षा भी जुड़ी है। हालांकि, सर्वेक्षण के समय उपयोगकर्ता सोशल नेटवर्क और मनोरंजन से जुड़ी वेबसाइटों का उपयोग करते मिले, लेकिन सेकंडरी/ डिप्‍लोमा/ व्‍यावसायिक पाठ्यक्रमों या उससे ऊंची शिक्षा प्राप्‍त कर चुके लोग शिक्षा/ नौकरियों के बारे में इंटरनेट से सूचनाएं प्राप्‍त करते पाए गए। शैक्षणिक स्‍तर से परे, ऑनलाइन लेन-देन और ई-गवर्नेंस सेवाओं का उपयोग बेहद सीमित देखा गया। इससे स्‍पष्‍ट है कि विविध शैक्षणिक स्‍तरों और इंटरनेट की बहुत बुनियादी ढांचागत व्‍यवस्‍था के बीच रहने वाली निम्‍नवर्गीय जनसंख्‍या में ये सेवाएं अभी तक पहुंच नहीं सकी हैं।

कंप्‍यूटर कौशल की कमी – कंप्‍यूटर और अन्‍य डिजिटल साधनों, जैसे स्‍मार्टफोन और टैबलेट के उपयोग में दक्षता की कमी अध्‍ययन क्षेत्र की जनसंख्‍या को डिजिटल संसार से दूर करती है। उन परिवारों में, जहां किसी सदस्‍य को कंप्‍यूटर चलाना आता है, वहां उसके इंटरनेट से जुड़ने की संभावना कंप्‍यूटर चलाना न जानने वाले व्‍यक्‍ति से चार गुना अधिक होती है।

लैंगिक कारण – लैंगिक भेद साक्षरता दर में ही दिखाई देता है। पुरुषों की 87 प्रतिशत साक्षरता के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता 70 प्रतिशत है। 79 प्रतिशत पुरुषों के पास अपना मोबाइल फोन है, जबकि महिलाओं में यह 40 प्रतिशत है। पुरुषों की तुलना में कम ही महिलाएं कंप्‍यूटर संचालन में दक्षता रखती हैं। लेकिन महिलाओं के लिए सबसे बड़ी रुकावट इंटरनेट चलाने के लिए किसी माध्‍यम और इसकी स्‍वतंत्रता का न होना है, जिससे वे खुद या परिवार के सदस्‍य के उपकरण या सायबर कैफे जैसे किसी सार्वजनिक सुविधा केंद्र से इंटरनेट चला सकें। अध्‍ययन क्षेत्र की नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों में पाया गया कि महिलाओं के लिए इंटरनेट असुरक्षित और अनुपयोगी समझा जाता है।

व्‍यवहारमूलक कमजोरियां – इंटरनेट का उपयोग न करने वाले कुछ परिवार इस साधन को अप्रासंगिक मानते हैं, जिसमें उनके लिए कुछ भी उपयोगी नहीं है। कुछ अन्‍य परिवार इसे लत लगाने वाला और वक्‍त बरबाद करने का साधन मानते हैं, जिसका दुरुपयोग होने की प्रबल आशंका है।

अध्‍ययन क्षेत्र में बसाहट सघन, अस्‍वास्‍थ्‍यकर है। लोगों की आर्थिक और शैक्षणिक योग्‍यता भी कम है। आवास की समस्‍या है और डिजिटल साधनों का ढांचा कमजोर है। इन सबके बावजूद लोगों के लिए डिजिटल संचार बहुत ही जरूरी है। अध्‍ययन के दौरान 97 प्रतिशत परिवारों के पास मोबाइल फोन और 89 प्रतिशत परिवारों के पास टेलीविजन पाया गया। इंटरनेट का उपयोग करने वाले 80 प्रतिशत लोगों और इस साधन का उपयोग न करने वाले 78 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इंटरनेट की जरूरत उन्‍हें उतनी ही है, जितनी बिजली की। लोगों में इंटरनेट से जुड़ने और डिजिटल समाज का हिस्‍सा बनने की प्रबल इच्‍छा देखी गई।

सिफारिशें

सीसीडीएस का अध्‍ययन पूरे देश में मनाई जा रही डिजिटल क्रांति की वास्‍तविकताओं को प्रदर्शित करता है। यह दिखाता है कि डिजिटल इंडिया जैसी महत्‍वाकांक्षी परियोजना को केवल ब्रॉडबैंड के कुछेक संपन्‍न उपयोगकर्ताओं के बजाय सभी नागरिकों के लिए अगर समावेशी नहीं बनाया गया तो यह तर्कसंगत नहीं होगा। अध्‍ययन यह भी बताता है कि डिजिटल समानता केवल लोगों को इंटरनेट से जोड़ने की ही बात नहीं है, बल्‍कि यह सुनिश्‍चित करना भी है कि सभी को तेज गति वाली किफायती इंटरनेट सेवाओं तक पहुंच बनाने का बराबर मौका मिले, साथ ही इस तकनीक का पूरी तरह से उपयोग कर पाने की उनकी दक्षता भी हो।

अध्‍ययन से निकले तथ्‍यों के आधार पर हमारी कुछ सिफारिशें इस प्रकार हैं –

  • डिजिटल असमानता पर जारी बहस नए सिरे से शुरू की जाए, जिसमें प्रमुख रूप से जोर इस तकनीक तक लोगों की पहुंच बनाने और इसे स्‍वीकार करने को लेकर रहे, साथ ही इस तकनीकी के सामाजिक परिप्रेक्ष्‍य पर भी ध्‍यान दिया जाए।

  • शहरी वंचित समुदाय को उच्‍च गुणवत्‍ता का इंटरनेट उपलब्‍ध कराया जाए। मुफ्त या रियायती दरों पर वाईफाई हॉटस्‍पॉट्स उन्‍हें मोबाइल पर इंटरनेट सुविधा जल्‍दी तो उपलब्‍ध करा सकते हैं, किन्‍तु इंटरनेट की पूर्ण उपलब्‍धता सार्वजनिक स्‍थानों पर कंप्‍यूटर आधारित हाईस्‍पीड ब्रॉडबैंड के रूप में दी जा सकती है। लेकिन ऐसे केंद्र निम्‍न आय वर्ग की बस्‍तियों के नजदीक हों, ताकि महिलाओं को विशेषरूप से सुविधा हो। इंटरनेट उपयोग के लिए प्रेरक की उपस्‍थिति उपयोगकर्ताओं को इस साधन के पूरी तरह इस्‍तेमाल के लिए प्रोत्‍साहित करेगी, जिसमें हकदारीमूलक और योजनागत सेवाएं भी शामिल हैं।

  • छोटी-छोटी कार्यशालाओं और प्रशिक्षण शिविरों के जरिए उपयोगकर्ताओं की कुशलता को बढ़ाया जाना चाहिए। इन कार्यशालाओं में दृश्‍य-श्रव्‍य माध्‍यमों के जरिए प्रशिक्षण दिया जाए, इनका समय लोगों की सुविधा के अनुकूल हो और सभी तरह के सूचना-संचार प्रशिक्षण समुदाय की जरूरत को ध्‍यान में रखकर उपलब्‍ध कराई जाए।

  • सूचना-संचार के प्रशिक्षण की गुणवत्‍ता को बढ़ाने और उन स्‍कूलों में इसके लिए ढांचागत सुविधाओं में वृद्धि करने की जरूरत है, जहां नि‍म्न आय वर्गीय बस्‍तियों के बच्‍चे पढ़ते हैं।

  • इंटरनेट और इसके फायदे के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए समुदाय विशेष के उपयोग के बारे में ठोस उदाहरण तैयार किए जाएं, साथ उनके लिए इंटरनेट के महत्‍व को प्रदर्शित किया जाए।

  • इंटरनेट के सुरक्षित और जिम्‍मेदार उपयोग के बारे में लोगों को बताया जाए, ताकि इस साधन की सामाजिक स्‍वीकार्यता बढ़े।

  • इंटरनेट पर स्‍थानीय रूप से प्रासंगिक सामग्री और सेवाओं का विकास हो और उन्‍हें क्षेत्रीय भाषाओं में तैयार किया जाए, ताकि शहरी वंचित समुदाय अपनी आजीविका, स्‍वास्‍थ्‍य, आवास, शिक्षा, व्‍यक्‍तिगत उन्‍नति, सार्वजनिक सुविधाओं और हकदारीमूलक सेवाओं के लिए उनका उपयोग कर सकें।

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